सन्तती के प्यार में भुलती उम्र क्या चीज है
कर्म करे तो भी उम्र आँख की धूल होती है ।
पुस्तैनी में दकारते बृद्धाको सम्मान दे न सकती
बृद्धाश्रम, धर्मशाला दीखाते समय की ढोंग करती ।
कहानी जुवान की हरवक्त तोडमरोडती मुखौटामें
सच कडवा होती मुह फिरकर चलती बीच रास्तेमें ।
कहने का कुछ न बचे खाने को कुछ न मीलते
लकडी के सहारे बचे उम्र को वेवश बोझ उठाते ।
१२।२६।२०१७
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