कर्म से हारा
विवश ये जीवन
पेड काटते
भुखे हैं बालबच्चें
कैसे लौटूँ घर में ।
धन्य है पेड
घाव पीडा सहते
ईश्वर जैसे
फिर भी प्यार देते
जीने की वास्ता देते ।
१२।२६।२०१७
दील की हर धडकन, पानी के बूंद जैसे, जीवन काे सिंचती, वाे एहसास दीलाती कीतनी रंग में, कीस पल में, काेही न जानती, एेसे में एक कलम उठती ।
धूप हो या धूल मस्त है जीवन साथीयों से मीले जब अनन्द मनाते हम कौन बडा , छोटा है कौन दिल से रिस्ता निभाते हम खेलखेल में मित...
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